Sunday, 4 October 2015

पत्थर से हो गए


मिट्टी के बने थे
पर पत्थर से हो गए
दुनिया की इस भीड़ में
हम भी औरो जैसे हो गए

दिल का एक हिस्सा
मुझे आज भी बताता है
क्या सही और क्या गलत
उसकी पहचान करवाता है
पर वो, पत्थर का जिस्म
ऐसी कर्म करवाता है
की सही और गलत में
अंतर मिटता जाता है
एक समय बाद
सही गलत, और गलत सही
लगने लगता है
इंसान को इंसान
समझू
जीवन ऐसे ही चलने लगता है
समाज ने सिखाया है
तो पैसे में कुछ तो
ख़ास बात होगी
ऐसी ही नहीं
ईमान बेच देती दुनिया
पैसे की भी
अपनी एक जुबां होगी

क्या करूँगा उस पैसे का
जो किसी और के काम आये
क्या ही फायदा
ऐसी पैसे का
जो मेरे साथ ही जाए
आये थे यह कहकर
की एक दिन शान से मिलेंगे
पर ऐसी कर्म कमाए है
की अब वापस जाने से ही डरेंगे
और कमाओ, और कमाओ
के चक्कर में
ऐसी हम फसे है
की मिटटी से आये थे
पत्थर से हो गए
दुनिया की इस भीड़ में
हम भी कही खो गए

-जे.पी.सिंह