Saturday, 20 June 2015

Collect Memory Not Things


ज़िन्दगी में कुछ चीज़े होती है जो हमेशा साथ रह जाती है, चाहे जितनी भी कोशिश करो पर वो चीजे हमेशा आपके साथ चलेंगी| यही वह चीजे होती है जो सोचने पर मजबूर करती है की ज़िन्दगी का मतलब क्या है, कौन चलाता है ज़िन्दगी, जो कभी राजा हुआ करते थे कौन बनाता है उन्हें रंक| ऐसा ही एक मौका मिला जब एक सहयोगी ने उसके साथ एक वृद्धाश्रम चलने का निमंत्रण दिया| पहले तो मन किया की मना कर दूँ, पर फिर सोचा चलकर देखा जाए की ऐसी कौन सी परिस्थिआँ होती है, जो बच्चो को मजबूर कर देती की अपने माता पिता को वृद्धाश्रम छोड़ आये| वृद्धाश्रम पहुचने पर मिस्टर घई ने स्वागत किया, 86 वर्ष के सबसे जवान सदस्य उस वृद्धाश्रम के, हस्ते हस्ते चुटकुले सुनाने वाले, पिछले 15 साल से वही रह रहे है, 5 सितारा होटल के मैनेजर हुआ करते थे कोलकता में अपने वक़्त में, आज भी उसी तौर तरीके से रहते है, एक दम फॉर्मल कपड़ो में| किसी ने बताया की सर्दिओ में टाई वगैरह लगाकर सूट बूट पहनकर एक दम टिच रहते है, अंग्रेजी में ही बात करते है| शायद कही न कही घई साहब ने यह स्वीकार लिया है की ज़िन्दगी बस अब यही चार दीवारो में सिमट गई है और अब इस वृद्धाश्रम के साथी ही उनका परिवार है, इसलिए शायद अब ज्यादा खुश रहते है, एकदम लीडर की तरह, हसाँते है, डांटते है, सबका ध्यान भी रखते है, किसी की तबियत ख़राब थी वृद्धाश्रम में, उम्र के कारण हर कमरे में जा नहीं सकते घई साहब, तो हमसे पूँछ रहे थे की उसे क्या हुआ| खुद ही बतांते है की अगर वृद्धाश्रम ना आता तो कब का मर गया होता, पता नहीं मन तो यही बोला की घई साहब को यहाँ नहीं होना चाहिए, पर ज़िन्दगी कब क्या रंग दिखाए किसी को कुछ नहीं पता| शायद अगर उनका मन टटोला जाये तो ना जाने कितने ही ज़ख़्म रिसने लगेंगे, ज्यादा पुछा नहीं, बहरहाल वो वहा खुश है, कम से कम दिखाते यही है| एक कविता का प्रिंटआउट दिया और बोला पढ़कर सुनाओ सबको, कविता के शब्द दिखाते है अंदर से कितने टूटे हुए है, पर रोज सुबह उठते है एक सिपाही की तरह जो हिम्मत नहीं हारेगा और आखरी दम तक लड़ता रहेगा|

मंदिर में पूजा करे, घर में करे कलेश
बापू तो बोझा लगे, पत्थर लगे गणेश
बचे कहा अब शेष है, दया, धरम, ईमान
पत्थर के भगवान है, पत्थर दिल इंसान
पत्थर के भगवन को, लगते छप्पन भोग
मर जाते फूटपाथ पर, भुखे प्यासे लोग
फैला है पाखंड का, अंधकार सब और
पापी करते जागरण, मचा मचा कर शोर
पहन मुखुटा धर्म का, करते दिन भर पाप
भंडारे करते फिरे, घर में भूखा बाप
                                         - न. घई
अब आगे बढ़े, बाकी सदस्यों से भी मिलना था| जिस सोच के साथ आया था वो बदल गई थी, अब चाहता था की इनके दुःख बाँट लू, चाहे कुछ ही पल की क्यों ना हो, कुछ खुशीआं इन्हे दे दूँ| कोई बताता था की उनका पोता 4 साल का हो गया है, पर उन्हें मिलने नहीं दिया जाता और बताते बताते रो पड़ता था, कोई पूछता था की कहा रहते हो, हमसे मिलते रहा करो, हमें बहार जाने नहीं दिया जाता, कोई अपनी जवानी के दिन याद करता था की वो क्या करते थे, कहा कहा बिज़नेस था, और कैसे वो यहा पहुँच गये| चाहे ज़िन्दगी कितनी भी मुश्किल रही हो, ये लोग फिर भी हसना नहीं भूले, नहीं भूले इंसानियत को, एक कमरे में गये, पता चला की इतने सालो बाद भी इस कमरे के दादा दादी ने एक दूसरे साथ नहीं छोड़ा, आज भी एक दूसरे की हिम्मत बनकर खड़े है| दादाजी ने बताया उनका फ्रूट का बिज़नेस था, पर उनकी पत्नी की तब फ्रूट पसंद नहीं थे, अब फ्रूट मांगती है खाने को पर अब पैसे नहीं है, तो जितना हो पता है वो लाते है फ्रूट, शायद यही सच्चे प्यार की परिभाषा है, जो अपने साथी की ख़ुशी में ख़ुशी ढूंढता है | हमसे भी पुछा की एक तरबूज रखा है, अगर खाएंगे तो? दिमाग में यही आया की अभी भी बाँटना और मिल बांटकर खाना नहीं भूले, अभी भी दुसरो की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूंढते है, क्या सही में यह जगह उनके लिए सही है, कौन ही ऐसा माँ बाप को अपने से दूर रख सकता है| इसी तरह सबसे मिले, कहानियां बहुत है बताने को, शायद कॉलम का स्पेस काम पड जाए|
मैंने अपने पिता को छोटी उम्र में खोया था , तो मन में हमेशा यही रहता है की मैं उन्हें वो दे नहीं पाया जो उन्हें मिलना चाहिए था, आज सबकुछ है पर वो नहीं, पर आज पता चला की कितने अभागे है वो लोग जो अपने माँ बाप के होते हुए भी उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ते है| मैं सोचता हूँ मुझे और वक़्त क्यों नहीं मिला अपने पिता के साथ बिताने को, और वहा ज़िंदा होते हुए भी लोग अपने माँ बाप को छोड़ जाते है| ज़िन्दगी भी बड़ी अजीब चीज है|
कही ना कही थोड़ी सफलता मिलने पर ऐसा लगने लगता है की मैं ही इस दुनिया का राजा हुँ| दुसरो को इंसान समझना ही बंद कर देता हुँ| ये भूल जाता हुँ की पता नहीं आने वाला कल कैसा होगा, पता नहीं वक़्त क्या रंग दिखायेगा| शायद सफलता मिलने के बाद, मुझे भी एक दिन डूबा दिया जायेगा, पर एक चीज तो सीखी आज, अगर किसी का अच्छा कर सकते हो तो कर दो|
अब वक़्त था अलविदा कहने का, उनकी मायूस ऑंखें  साफ़ बोल रही थी की हमें भी साथ ले चलो, हमें नहीं रहना यहा , हमें भी बाहर की दुनिया देखनी है, खुलकर हसना है, खुलकर जीना है, पर हमसब की भी अपनी मजबूरियां है, फिलहाल उनसे जल्द ही दोबारा मिलने का वादा देकर वहा से आये| एक ही बात कहना चाहता था, शायद जिस वजह से यह कॉलम लिखा, अच्छे कपडे, दोस्तों, शॉपिंग, धूम धमाल, गेट टूगेदर और मौज मस्ती के लिए वक़्त निकल लेते हो तो एक दिन इन बूढो के लिए भी वक़्त निकालो चाहे दिन का एक घंटा ही, साल में एक बार, उनको अच्छा लगेगाशायद कोई भी और चीज मन को वो तसली नहीं देगी जितनी किसी के चेहरे पर ख़ुशी लाना देती है|


-जे. पी. सिंह