Wednesday, 31 July 2013

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी
तेरी चाहत क्या है
मुझे यह दे बता
क्यों देती है
हर मोड पर यह सजा
कभी मुझसे भी पूछ
क्या है मेरी रजा
क्यों रहती है
तू मुझसे खफा
अगर दी है साँसे
तो जीने का
अधिकार भी दिला

सपने तो दिखा देती है
उन्हें पूरा करने का
रास्ता भी बतला
भटकता रहूँगा नहीं तो
ज़िन्दगी भर इसी तरह
कुछ कर ऐसा
जिससे मेरा होसला बढ़ा
आज तो कट रही है जैसे तैसे
बस एक बार आने वाले कल की तस्वीर दिखा

आखिर में एक ही गुजारिश है
या तो मुझे सपने मत दिखा
नहीं तो उन्हें पूरा करने की राह दिखला
तांकि मरने से पहले बोलना पड़े
यार ज़िन्दगी तो है एक जुआ 
जिसके निकल पड़े
वो छुले आसमान
नहीं तो सब
धुआ ही धुआ

ज. प. सिंह