Wednesday, 10 April 2013


ज़िन्दगी


तिनको के पत्तो की तरह
बिखरती है ज़िन्दगी
कुछ पूछो तो 
बेबांक हस्ती है ज़िन्दगी
बिना कुछ कहे 
सवाल करती है ज़िन्दगी
कामयाबी के पास पहुंचाकर
क्यों रुसवा करती है ज़िन्दगी

जितना समझो 
उतना ही उलझती है ज़िन्दगी
बिना बोले 
फिर खुद से ही संभलती है ज़िन्दगी
क्यों मिली है मुझे हमेशा
ऐसा कुछ पूछती है ज़िन्दगी
मैं हस देता हु
इतना पता हो तो जी ना
लेता तुझे मेरी ज़िन्दगी

अंत में मैंने भी पुछा
क्यों नहीं 
अपने राज बताती तू ज़िन्दगी
क्यों नहीं 
वो अनदेखा हिस्सा दिखाती तू ज़िन्दगी
इस बार वो हस्सी और बोली
जीलो जितना जी सकते हो
ऐसी ही नहीं किसी को मिल जाती यह ज़िन्दगी

                                                                                             --जे. पि.सिंह